स्वाध्याय और साधना से सिद्धत्व को भी प्राप्त किया जा सकता है : मुनि श्री
कल्याण मार्ग को जानने वाला पाप कर्म को शत्रु के रूप में जानता है । स्वाध्याय और साधना से सिद्धत्व को भी प्राप्त किया जा सकता है।
- मुनी समय सागर जी
Rehli/रहली ........जो जीव कल्याण को जानने वाला होता है वह पाप कर्म को शत्रु के रूप में और धर्म को बंधु के रूप में जानता है ऐसा मानते हुए वह जीव अतिशीघ्र कल्याण को प्राप्त करता है ।
जैन धर्मशाला रहली में प्रातः धर्म सभा को संबोधन देते हुए पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि समय सागर जी ने कहा दोनों निमित्त हैं ,एक वहिरंग दूसरा अंतरंग ।ग्रहस्थ श्रावक वहिरंग दृष्टि रखता है जिसमें वह मित्र और शत्रु भाव को मानता है ,वह श्रावक होते हुए थोड़े समय धर्म क्रियाओं को करने के पश्चात बाकी समय संसारी विषय और कषायों में उलझा रहता है।
. वह स्वप्न भी देखें तो कभी भगवान का समवशरण, मंदिर ,मुनिराज नहीं देखता? उसे संसार में अपने संबंधी, घर, दुकान, गाड़ी, ग्राहक संवाद जैसे विषय स्वप्न में देखता है !यह श्रावक की अज्ञानता दशा है ।
दो व्रत होते हैं अणुव्रत और महाव्रत, अणुव्रति श्रावक और श्रमण महाव्रति होता है।अणुव्रति का उदाहरण देते हुए मुनी समय सागर जी ने आगम में वर्णित सुदर्शन सेठ की कहानी सुनाई वे अणुव्रति थे, प्रतिमाएं धारण कर रखी थी, वे श्मशान में जाकर वस्त्र त्याग नग्न अवस्था में खड़े होकर सामायिक तत्व चिंतन करते थे! चिंतन में पंच परमेष्ठी का स्मरण करते थे ।शांत मुद्रा में अल्प समय को निर्वस्त्र होकर मुनि अवस्था में रहने का भी अभ्यास करते थे? बाकी समय संसारी ग्रस्त कार्य करते थे, महाव्रति नहीं थे फिर भी असंख्यात कर्मों की निर्जरा करते रहते थे। वह देश व्रति भी कहलाते हैं। इसे सामयिक क्रिया भी कहते हैं।
शब्द को जानिए (सामायिक) और (सामयिक) में अंतर है (सामयिक) अणुव्रति ग्रहस्थ दशा में करता है, और महाव्रति श्रमण (सामायिक )करता है। श्रमण एक बार दिगंबर होकर कभी वस्त्र धारण नहीं करता !वह हर समय स्वाध्यायी होकर निरंतर महव्रतों का पालन करता रहता है ।उसे सामायिक कहते हैं।
मुनि श्री ने सरल भाषा में समझाते हुए कहा" आगम" शास्त्र से हमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है, यह औपचारिक है ?हमें पुस्तक ग्रंथ से ज्ञान नहीं संकेत मिलते हैं? वह लिपि है !वह चक्षु इंद्रिय का विषय है? किंतु शब्द कर्ण इंद्रिय का विषय जो जिम्हा और तालू से संबंध रखता है ।
आगम को आत्मा के साथ तादात्म संबंध माना जाता है ,मान लो ग्रंथ गुम गया ?कोई चिंता नहीं, क्योंकि ज्ञान चोरी नहीं होता, उसमें जो ज्ञानवर्धक लिखा था ,वह पुनः लिखा जा सकता है ।रत्नात्रय आध्यात्म तो अक्षुण्य निधि है ।
पानी में मीन प्यासी ,
मोहे सुन सुन आवे हांंसी।
पानी में रहते हुए जिस तरह मछली प्यासी रहती है ,ऐसा कहा जाता है? उसी प्रकार मनुष्य ज्ञानी होते हुए भी अपने को अज्ञानी बनाये बैठा रहता है ।ज्ञान उसके अंदर है पर मोह के अंधकार को हटाने ज्ञान की ज्योति जलाने की जरूरत है।
शास्त्र थोड़ा सा पड़ा रख दिया ऐसा देखा जाता है पर स्वाध्याय का भाव जब तक भीतर से नहीं जागता तब तक ज्ञान स्थाई रूप से नहीं रहता, हम पढ़ते हैं और भूल जाते हैं, मनुष्य जब चाहे जब ज्ञानार्जन की शुरुआत कर सकता है उसे सतत्, अभ्यास बनाए रखने की जरूरत होती है। स्वाध्याय और साधना से सिद्धत्व को भी प्राप्त किया जा सकता है।
Rehli CIty
- मुनी समय सागर जी
Rehli/रहली ........जो जीव कल्याण को जानने वाला होता है वह पाप कर्म को शत्रु के रूप में और धर्म को बंधु के रूप में जानता है ऐसा मानते हुए वह जीव अतिशीघ्र कल्याण को प्राप्त करता है ।
जैन धर्मशाला रहली में प्रातः धर्म सभा को संबोधन देते हुए पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि समय सागर जी ने कहा दोनों निमित्त हैं ,एक वहिरंग दूसरा अंतरंग ।ग्रहस्थ श्रावक वहिरंग दृष्टि रखता है जिसमें वह मित्र और शत्रु भाव को मानता है ,वह श्रावक होते हुए थोड़े समय धर्म क्रियाओं को करने के पश्चात बाकी समय संसारी विषय और कषायों में उलझा रहता है।
. वह स्वप्न भी देखें तो कभी भगवान का समवशरण, मंदिर ,मुनिराज नहीं देखता? उसे संसार में अपने संबंधी, घर, दुकान, गाड़ी, ग्राहक संवाद जैसे विषय स्वप्न में देखता है !यह श्रावक की अज्ञानता दशा है ।
दो व्रत होते हैं अणुव्रत और महाव्रत, अणुव्रति श्रावक और श्रमण महाव्रति होता है।अणुव्रति का उदाहरण देते हुए मुनी समय सागर जी ने आगम में वर्णित सुदर्शन सेठ की कहानी सुनाई वे अणुव्रति थे, प्रतिमाएं धारण कर रखी थी, वे श्मशान में जाकर वस्त्र त्याग नग्न अवस्था में खड़े होकर सामायिक तत्व चिंतन करते थे! चिंतन में पंच परमेष्ठी का स्मरण करते थे ।शांत मुद्रा में अल्प समय को निर्वस्त्र होकर मुनि अवस्था में रहने का भी अभ्यास करते थे? बाकी समय संसारी ग्रस्त कार्य करते थे, महाव्रति नहीं थे फिर भी असंख्यात कर्मों की निर्जरा करते रहते थे। वह देश व्रति भी कहलाते हैं। इसे सामयिक क्रिया भी कहते हैं।
शब्द को जानिए (सामायिक) और (सामयिक) में अंतर है (सामयिक) अणुव्रति ग्रहस्थ दशा में करता है, और महाव्रति श्रमण (सामायिक )करता है। श्रमण एक बार दिगंबर होकर कभी वस्त्र धारण नहीं करता !वह हर समय स्वाध्यायी होकर निरंतर महव्रतों का पालन करता रहता है ।उसे सामायिक कहते हैं।
मुनि श्री ने सरल भाषा में समझाते हुए कहा" आगम" शास्त्र से हमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है, यह औपचारिक है ?हमें पुस्तक ग्रंथ से ज्ञान नहीं संकेत मिलते हैं? वह लिपि है !वह चक्षु इंद्रिय का विषय है? किंतु शब्द कर्ण इंद्रिय का विषय जो जिम्हा और तालू से संबंध रखता है ।
आगम को आत्मा के साथ तादात्म संबंध माना जाता है ,मान लो ग्रंथ गुम गया ?कोई चिंता नहीं, क्योंकि ज्ञान चोरी नहीं होता, उसमें जो ज्ञानवर्धक लिखा था ,वह पुनः लिखा जा सकता है ।रत्नात्रय आध्यात्म तो अक्षुण्य निधि है ।
पानी में मीन प्यासी ,
मोहे सुन सुन आवे हांंसी।
पानी में रहते हुए जिस तरह मछली प्यासी रहती है ,ऐसा कहा जाता है? उसी प्रकार मनुष्य ज्ञानी होते हुए भी अपने को अज्ञानी बनाये बैठा रहता है ।ज्ञान उसके अंदर है पर मोह के अंधकार को हटाने ज्ञान की ज्योति जलाने की जरूरत है।
शास्त्र थोड़ा सा पड़ा रख दिया ऐसा देखा जाता है पर स्वाध्याय का भाव जब तक भीतर से नहीं जागता तब तक ज्ञान स्थाई रूप से नहीं रहता, हम पढ़ते हैं और भूल जाते हैं, मनुष्य जब चाहे जब ज्ञानार्जन की शुरुआत कर सकता है उसे सतत्, अभ्यास बनाए रखने की जरूरत होती है। स्वाध्याय और साधना से सिद्धत्व को भी प्राप्त किया जा सकता है।
Rehli CIty


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