रहली:त्रिरूपधारणी है रानगिर माता हरसिद्दी
_हरसिद्दी रानगिर माता के दरबार में होती है मनोकामनाये पूरी।::#रहली-- सागर जिले की रहली तहसील में पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे छोटे से ग्राम रानगिर मेंप्रसिद्ध हरसिद्धि माता का मंदिर है। यह क्षेत्र शक्ति साधना के लिए जाना जाता है। यहां चैत्र एवं शारदेय नवरात्र पर भव्य मेला लगता है। पहले आवागमन के साधनों के अभाव एवं पहुंच मार्गों की दशा ठीक नहीं होने के कारण मेला सिर्फ तीन दिन लगता था परन्तु विगत वर्षों में इस क्षेत्र में हुए विकास कार्यों के कारण माता के दरबार तक आना-जाना सुगम हो गया है मेला स्थल पर भी सुविधाएं होने के कारण यहां लगभग साल भर ही मेले जैसा माहौल रहता है।
#माता_दिन_में_तीन_रूप_धारण_ करने_प्रसिद्धनवरात्रि के दिनों में माता के दर्शन कर आराधना करने का विशेष महत्व होने के कारण भारी भीड़ होती है। प्राचीन काल से ऐसी मान्यता है कि माता से जो भी मन्नत मांगी जाती है वह पूर्ण होती है। इसी कारण माता को हरसिद्धि माता पुकारा जाता है। सिद्धिदात्री माता दिन में तीन रूप धारण करने को भी प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि प्रातः काल में माता बाल कन्या के रूप में दर्शन देती हैं। दोपहर बाद माता नवयुवती-नवशक्तिका रूप धारण कर लेती हैं। शाम ढलने के बाद वह वृद्ध माता के रूप में भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।
#माता_का_इतिहासमंदिर का निर्माण कब और कैसे हुआ इसका कोई प्रमाण नहीं है परन्तु यह मंदिर अतिप्राचीन और ऐतिहासिक है। इतिहासकारों के मुताबिक कुछ लोग इसे महाराज छत्रसाल द्वारा बनवाए जाने की संभावना व्यक्त करते हैं क्योंकि सन् 1726 में सागर जिले में महाराज छत्रसाल द्वारा कई बार आक्रमणों का उल्लेख इतिहास में वर्णित है। सिंधिया राज घराने का संबंध भी रानगिर से होना बताया जाता है।
#वन_कन्या_देती_थी_चांदी_का_ सिक्काहरसिद्धि माता के बारे में कई किवदन्तियां प्रचलित हैं। एक किवदन्ती के अनुसार रानगिर में एक चरवाहा हुआ करता था। चरवाहे की एक छोटी बेटी थी। बेटी के साथ एक वन कन्या रोज आकर खेलती थी एवं अपने साथ भोजन कराती थी तथा रोज एक चांदी का सिक्का देती थी। चरवाहे को जब इस बात की जानकारी लगी तो एक दिन छुपकर दोनों कन्या को खेलते देख लिया चरवाहे की नजर जैसे ही वन कन्या पर पड़ी तो उसी समय वन कन्या ने पाषाण रूप धारण कर लिया। बाद में चरवाहे ने कन्या का चबूतरा बना कर उस पर छाया आदि की और यहीं से मां हरसिद्धि की स्थापना हुई।#रानगिर_का_रहस्यदूसरी किवदन्ती के अनुसार भगवान शंकर जी ने एक बार सति के शव को हाथों में लेकर क्रोध में तांडवनृत्य किया था। नृत्य के दौरान सती माता के अंग पृथ्वी पर गिरे थे। सती माता के अंग जिन जिन स्थानों पर गिरे वह सभी शक्ति पीठों के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसी मान्यता है कि रानगिर में सतीमाता की राने (जांघें) गिरी थीं और इसीलिए इस क्षेत्र का नाम रानगिर पड़ा। रानगिर के पास ही गौरीदांत नामक क्षेत्र है यहां सती माता के दांत गिरना माना जाता है। एक अन्य किंवदन्ती के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान रानगिर के पर्वतों पर विश्राम किया था और इस कारण इस क्षेत्र का नाम रामगिरी था जो बाद में रानगिर हो गया।#कैसे_पहुंचेंदेहार नदी के पूर्व तट पर घने जंगलों एवं सुरम्य वादियों के बीच स्थित हरसिद्धि माता के दरबार में पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय सागर से दो तरफा मार्ग है। सागर, नरसिंहपुर नेशनल हाइवे पर सुरखी के आगे मार्ग से बायीं दिशा में आठ किलोमीटर अंदर तथा दूसरा मार्ग सागर-रहली मार्ग पर पांच मील नामक स्थान से दस किलोमीटर दाहिनी दिशा में रानगिर स्थित है। मेले के दिनों में सागर, रहली, गौरझामर, देवरी से कई स्पेशल बस दिन-रात चलती हैं। दोनों ओर से आने-जाने के लिए पक्की सड़कें हैं। निजी वाहनों से भी लोग पहुंचते ह
#माता_का_इतिहासमंदिर का निर्माण कब और कैसे हुआ इसका कोई प्रमाण नहीं है परन्तु यह मंदिर अतिप्राचीन और ऐतिहासिक है। इतिहासकारों के मुताबिक कुछ लोग इसे महाराज छत्रसाल द्वारा बनवाए जाने की संभावना व्यक्त करते हैं क्योंकि सन् 1726 में सागर जिले में महाराज छत्रसाल द्वारा कई बार आक्रमणों का उल्लेख इतिहास में वर्णित है। सिंधिया राज घराने का संबंध भी रानगिर से होना बताया जाता है।
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REPORT : PRAVEEN SONI REHLI CITY
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