विश्व विकलांगता दिवस विशेष,दिव्यांग सीताराम के नगाडा सुन झूम उठते है दर्शक
विश्व विकलांगता दिवस विशेष
दिव्यांग सीताराम के नगाडा सुन झूम उठते है दर्शक
https://www.rehlicity.com/
Rehli ~ कहते है दुनिया में जन्म लेने वाले हर जातक को ऊपर वाला एक ऐसा हुनर जरूर देता है जिस वह अपना जीवन यापन कर सके ।लेकिन कुछ खमिया या मजबूरियां कारण अपने उस हुनर को ना दिखा पाये तो वह हुनर चार दिवारी के अंदर ही रह जाता है क्योंकि केवल कला को होना ही जरूरी नही जब तक उस कला का कद्रदान ना मिले तब तक कोई कला ऊपर नही उठ सकती है हर कला को निखरने के लिए कद्रदान होना बुहत जरूरी है नही तो प्रतिभा जहाँ से शुरू होती वही समाप्त हो जाती है। रहली के वार्ड 11 के निवासी दिव्यांग सीताराम जो आज से लगभग 15 साल पहले अपनी कला के दम पर अपना जीवनयापन कर रहे था सीताराम दिन में मजदूरी करके तो रात में रामलीला के लक्ष्मण के भूमिका का किरदार करके अपना गुजरा कर रहे थे लेकिन एक दिन अचानक सुबह उठा तो दोनों आँखों की रोशनी चली गई जिसके बाद सीताराम की पत्नी चार से पांच साल के एक बच्चे के साथ पति की आँखों के ईलाज के लिए भटके जितना हो सका ईलाज कराया लेकिन आँखों की रोशनी वापिस नही आई। आँखों की रोशनी जाने के महज 5 साल वाद पत्नी का स्वर्गवास हो गया। एक दस साल का छोटा बेटा और बूढ़ी माँ का दो वक्त खाना बड़ा कठिन हो गया था। मनो भगवान ही दिव्यांग सीताराम से रूठ गये हो जो एक मुसीबत के बाद दूसरी मुशीबत सामने खड़ी कर रहा हो ।फिर भी कहते है ऊपर वालेअगर आपका एक रास्ता बंद करता है तो उससे पहले दूसरा रास्ता खोल देते है शायद ऐसा ही हुआ जिसके बाद दिव्यांग सीताराम ने नगाड़ा बजाना सीखा तो नगाड़े में ऐसा हाथ जमा की जब भी कही नगाड़े बजा देता है तो नगाड़े सुनकर लोग झूम उठते है उसके इस हुनर ने उसे कम से कम इतना मशहूर तो कर दिया की कम से कम वह दो वक्त का खाना तो खुद और अपनी बूढ़ी माँ बच्चे को खिला सकता है।
दिव्यांग सीताराम के नगाडा सुन झूम उठते है दर्शक
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Rehli ~ कहते है दुनिया में जन्म लेने वाले हर जातक को ऊपर वाला एक ऐसा हुनर जरूर देता है जिस वह अपना जीवन यापन कर सके ।लेकिन कुछ खमिया या मजबूरियां कारण अपने उस हुनर को ना दिखा पाये तो वह हुनर चार दिवारी के अंदर ही रह जाता है क्योंकि केवल कला को होना ही जरूरी नही जब तक उस कला का कद्रदान ना मिले तब तक कोई कला ऊपर नही उठ सकती है हर कला को निखरने के लिए कद्रदान होना बुहत जरूरी है नही तो प्रतिभा जहाँ से शुरू होती वही समाप्त हो जाती है। रहली के वार्ड 11 के निवासी दिव्यांग सीताराम जो आज से लगभग 15 साल पहले अपनी कला के दम पर अपना जीवनयापन कर रहे था सीताराम दिन में मजदूरी करके तो रात में रामलीला के लक्ष्मण के भूमिका का किरदार करके अपना गुजरा कर रहे थे लेकिन एक दिन अचानक सुबह उठा तो दोनों आँखों की रोशनी चली गई जिसके बाद सीताराम की पत्नी चार से पांच साल के एक बच्चे के साथ पति की आँखों के ईलाज के लिए भटके जितना हो सका ईलाज कराया लेकिन आँखों की रोशनी वापिस नही आई। आँखों की रोशनी जाने के महज 5 साल वाद पत्नी का स्वर्गवास हो गया। एक दस साल का छोटा बेटा और बूढ़ी माँ का दो वक्त खाना बड़ा कठिन हो गया था। मनो भगवान ही दिव्यांग सीताराम से रूठ गये हो जो एक मुसीबत के बाद दूसरी मुशीबत सामने खड़ी कर रहा हो ।फिर भी कहते है ऊपर वालेअगर आपका एक रास्ता बंद करता है तो उससे पहले दूसरा रास्ता खोल देते है शायद ऐसा ही हुआ जिसके बाद दिव्यांग सीताराम ने नगाड़ा बजाना सीखा तो नगाड़े में ऐसा हाथ जमा की जब भी कही नगाड़े बजा देता है तो नगाड़े सुनकर लोग झूम उठते है उसके इस हुनर ने उसे कम से कम इतना मशहूर तो कर दिया की कम से कम वह दो वक्त का खाना तो खुद और अपनी बूढ़ी माँ बच्चे को खिला सकता है।
REPORT : PRAVEEN SONI REHLI CITY




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