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कोई दुख को बेच नहीं सकता सुख को खरीद नहीं सकता : आर्यका पूर्णमति जी

 कोई दुख को बेच नहीं सकता सुख को खरीद नहीं सकता : आर्यका पूर्णमति जी 


रहली .....दो कार्यों में बेबस है इंसान एक तो वह अपने दुखों को बेच नहीं सकता कोई ऐसा नहीं जो आपके दुख ले ले कोई  सुख को खरीद भी नहीं सकता।
 जैन धर्मशाला रहली में साप्ताहिक प्रवचन के दौरान आर्यिका पूर्णमति माताजी ने कहा कि एक गर्भवती मां भी उस बच्चे का दुख नहीं ले सकती जिसको 9 माह गर्भ में पाला है।
         शरीर घर धन स्त्री पुत्र मित्र दुश्मन यह मेरे हैं जब तक यह मिथ्या विचार मनुष्य धारण करता रहेगा तब तक मूल रहेगा। यह मेरे नहीं है यह मेरा स्वभाव भी नहीं है मेरे से भिन्न है  यह विचार मन में आ जाए तो सुखों का आना शुरू हो जाता है ।एक अंगुली में लगी चोट की पीड़ा दूसरी अंगुली उसकी संवेदना को अनुभव नहीं कर सकती। डॉक्टर के कहने पर तो मनुष्य विश्वास कर लेते हैं परंतु जनवाणी में कही हुई बात को जो भगवान की वाणी है उस पर विश्वास नहीं कर पाता, जिस दिन विश्वास हो जाएगा उसी दिन जीवन में सुख की शुरुआत हो जाएगी।
 उन्होंने उदाहरण स्वरूप एक कहानी के माध्यम से बताया कि एक राजा ने घोषणा कर दी कि जो भी पूर्णिमा की शाम को ठीक 5:00 बजे मुझसे मिलेगा उसे अपने राज्य का एक हिस्सा दे दूंगा। इतनी आकर्षण की घोषणा केसाथ एक विशाल मेला लगाया राजा ने मेला में मनोरंजन के साधन मौजूद कराऐ लोग उसमें इतने मस्त हो गए की उन्हें 5:00 बजे महल में पहुंचने का याद ही नहीं रहा ।एक 20 वर्ष का युवक ठीक 5:00 बजे महल पहुंच गया। दरबारियों ने उसे अंदर नहीं जाने दिया वह उन्हें पछाड़ कर राजा के पास पहुंच गया राजा ने पूछा और उसी वक्त युवा को आधा राज्य देने की वजह पूरा राज्य सौंप दिया। आज लोगों को धर्म के नाम पर दिखावा हो रहा है पर उसके प्रति निष्ठा और समय अनुकूल आराधना करने का वक्त नहीं है तब धर्म का साम्राज्य और सुख की अनुभूति कैसे होगी। इसी तरह आचार्य ज्ञानसागर जी ने 20 वर्ष के बालक विद्याधर को जिनशासन का उजाला पहुंचाने के लिए दीक्षा देकर हम सब को मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए अपने सामने ही अपना आचार्य का पद दे दिया आज वही महान गुरु आचार्य विद्यासागर जी सारे जगत के कल्याण और प्राणी मात्र को सुखों का संदेश दे रहे हैं।

REPORT : SUSHIL JAIN                      REHLI CITY  

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